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पशु आश्रय केंद्रों की बदहाली का आखिर जिम्मेवार कौन 

( बजट के अभाव में बदहाल पशु आशय केंद्र )

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पशु आश्रय केंद्रों की बदहाली का आखिर जिम्मेवार कौन 

( बजट के अभाव में बदहाल पशु आशय केंद्र )

मोहन लाल गंज / लखनऊ । तहसील व विकाश खंड मोहन लाल गंज की दर्जनो पंचायतों में खुले पशु आश्रय केंद्र अपनी दीन हीन दुर्दशा पर बजट के अभाव में दम तोड़ते नजर आ रहे है , और उनमे कैद बेजुबान गोवंश चिलचिलाती धूप में खुले आसमान के नीचे चारे व पानी के अभाव में गर्म हवाओ के बीच लू के थपेड़ो में कैद है । और बेजुबान गोवंश अपनी दीन हीन दशा पर आशु बहाते नजर आ रहे है , वही दूसरी ओर प्रशासन के लाख कोशिशों के बावजूद भी पशु आश्रय केंद्रों की ब्यवस्था दिन प्रतिदिन बेपटरी होती चली जा रही है । वही गोवंशों की सेहत का खयाल पशु पालन विभाग के जिम्मेवार कितना रख रहे है , और चार पानी की समुचित ब्यवस्था , व छाया का इंतजाम जिम्मेवारो के द्वारा किस तरह से किया गया है , इस बात की हकीकत उत्तरगांव , मीरखनगर , डाढ़ा सिकंदरपुर , गढ़ा , जबरौली , आदि गांवो में पहुचकर व ग्रामीणों से बात कर जमीनी हकीकत आखिर क्या है , इस बात का पता बड़ी आसानी से लगाया जा सकता है । वही दूसरी ओर पंचायत सचिव व प्रधान बजट का रोना रोते नही थकते , और बजट के अभाव में पशु आश्रय केंद्रों पर बदइंतजामी का आरोप लगा अपना अपना पल्ला झाड़ लेते है । इतना ही नही ग्रामीणों ने बताया कि रात मे कुछ गोवंशों को बाहर कर दिया जाता है और ये गोवंश गांव के पालतू मवेशियों को मारने लगते है और कभी कभी तो ये इतने उग्र हो जाते है कि ग्रामीणों पर भी हमला कर उन्हें घायल कर देते है , बात यही नही थमती बल्कि ये आवारा मवेशी सड़को पर पहुच दो पहिया वाहन चालकों से भी टकरा जाते है , हाइवे पर पहुच बड़े वाहन से भी टकरा जाते है । और चौराहों पर अपना कब्जा कर राहगीरों के लिए मुसीबत का सबब बन गये है । इनसे टकराकर आये दिन राहगीर चोटिल हुआ करते है । जिससे क्षेत्रीय जनमानस में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि खेत से खलिहान तक और सड़कों से लेकर हाइवे तक इनका आतंक बदस्तूर जारी है , वही जिम्मेवार अपनी जिम्मेवारी का निर्वहन करने से आखिर क्यों कतरा रहे है ये सवाल ग्रामीण जनता में जोरो पर है । ग्रामीणों ने बताया कि पशु आश्रय केंद्रों में अब्यवस्था की बात जिम्मेवारो से पूछने पर प्रधान , सचिवो पर और सचिव प्रशासन पर समय से बजट न मिल पाने की बात कह कर अपना पीछा छुड़ा ये कहते है कि कहा तक उधार ब्यवहार की नीति से काम चलेगा , और कब तक अपनी जेब ढीली करे आखिर सरकार समय से इनकी ब्यवस्था में खर्च होने वाली धनराशि मुहैया क्यो नही करवा पा रही है , और जिसका खामियाजा किसानों और गांवो के प्रधानों को जनता की खरी खोटी सुनकर चुकाना पड़ रहा है , बावजूद उसके भी आला अधिकारियों की उदासीनता दिन प्रतिदिन बढ़ती ही चली जा रही है और शाशन से समय पर बजट न आने का हवाला देकर वो भी शिकायतकर्ताओं को चुप करा और बजट के जल्द आने का आस्वाशन देकर मामले से अपना पीछा छुड़ा लेते है । इन सब बातों से विरक्त ग्रामीण किसान पशु आश्रय केंद्रों पर चल रही बदइंतजामी का ठीकरा सरकार पर फोड़ रहे है और आरोप भी लगा रहे है कि जब पशु आश्रय केंद्रों पर समुचित ब्यवस्था नही है तो उन्हें चालू क्यो करवा दिया गया और यदि चालू करवा दिया गया है तो जिम्मेवारो को अपनी अपनी जिम्मेवारी निभानी चाहिए और सरकार को भी , ताकि ग्रामीण किसानों की फसल और सड़क से लेकर हाइवे तक राहगीर इन आवारा पशुओं के आतंक से बच सके । और ग्रामीणों ने ये भी बताया कि जिम्मेवार ये भी कहते नही थकते की इन सब समस्याओं का समाधान बहुत जल्द कर दिया जाएगा और बजट की भी बदइंतजामी दूर करने व समय से कर देने की बात कर सामने वाले को चुप करा उक्त मामले से अपना अपना पल्ला झाड़ लेते है , वही दूसरी तरफ किसान खरीफ की फसल की बेढ़ करने की तैयारी में भी जुट चुके है। आखिर ग्रामीण किसानों के दिल का दर्द सुने भी तो कौन , और वो अपने मन की बात कहे भी तो किससे ।
सूरज अवस्थी , मोहन लाल गंज

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